मानसिक तनाव और आत्महत्या का बढ़ता साया | Mansik Tanaav Aur Aatmahatya Ka Badhta Saaya
आजकल अखबारों, टीवी चैनलों और मोबाइल न्यूज़ ऐप्स के फ्रंट पेज पर आत्महत्या की खबरें आम हो गई हैं।
जब मैं इन खबरों को ध्यान से पढ़ता हूँ, तो मन व्यथित हो उठता है।
अधिकतर आत्महत्या करने वाले नवयुवक या विद्यार्थी होते हैं — जिन्होंने अभी जीवन को सही मायनों में समझना भी शुरू नहीं किया होता।
जब मैंने इन घटनाओं के पीछे का कारण जानने की कोशिश की, तो पाया कि इसका मूल कारण एक ही है — मानसिक तनाव।
मुझे आश्चर्य हुआ कि आखिर यह कैसा तनाव है, जिसे हमारे बच्चे झेल नहीं पा रहे?
थोड़ी गहराई में जाने पर पता चला कि इसका बड़ा कारण है —
क्षमता से बढ़कर उम्मीद करना और उस उम्मीद पर खरा न उतर पाना।आज के बच्चों पर सबसे बड़ा दबाव है — हर परीक्षा में सौ प्रतिशत अंक लाने का।जब वे इस अपेक्षा को पूरा नहीं कर पाते, तो उन्हें लगता है कि जीवन समाप्त हो गया है।लेकिन कौन समझाए कि अच्छे अंक लाना ही जीवन की सफलता नहीं है।
वास्तविक सफलता तो वही है, जो असफलता से सीखकर आगे बढ़ने में है।असफलता हमें आत्महत्या के लिए नहीं कहती, बल्कि असली जीवन में मेहनत करने के लिए प्रेरित करती है।यदि कोई भी व्यक्ति किसी कार्य में असफल हो जाता है, तो उसे निराश नहीं होना चाहिए।बल्कि यह समझना चाहिए कि मैं असफल क्यों हुआ — कारण को पहचानें और उस पर मेहनत करें।क्या पता, उसी मेहनत से उसे पहले से भी बड़ी सफलता मिल जाए!
मैं आज जो भी हूँ, उसका श्रेय अपनी असफलताओं को देता हूँ।अगर मैं कभी असफल न हुआ होता, तो शायद आज इस मुकाम पर न पहुँचता।कई बार असफलता ही हमें उस ऊँचाई तक पहुँचा देती है, जिसकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की होती।असफलता हमें हिम्मत, अनुभव और मानसिक मजबूती प्रदान करती है।
मेरा प्रत्येक अभिभावक से अनुरोध है कि वे अपने बच्चों की
उम्मीदों के साथ-साथ उनका हौसला भी बढ़ाएँ।
बच्चों से उनकी क्षमता के अनुरूप अपेक्षाएँ रखें,
अपनी अधूरी इच्छाएँ उन पर न थोपें।
उन्हें असफलता से सफलता तक की कहानियाँ सुनाएँ —
जैसे थॉमस एडिसन ने बल्ब बनाने से पहले कितनी बार असफलता का सामना किया,
फिर भी हार नहीं मानी।
बच्चों को यह बात अवश्य समझाएँ किस सफलता और असफलता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।सफलता मिलने पर अधिक उत्साहित न हों,और असफलता मिलने पर कभी निराश न हों।
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