दुःख | Dukh
भगवान बुद्ध जी ने संसार को दुखों का घर बताया है। दुःख का मुख्य कारण मानव द्वारा उत्पन्न इच्छाएँ हैं। परंतु ये इच्छाएँ अनंत हैं और इनका कोई अंत नहीं है। इन इच्छाओं की पूर्ति के लिए मनुष्य अपने लिए दुःख उत्पन्न करता है और दुःख सहने को भी तैयार रहता है, फिर भी जीवन में दुःखों का अंत नहीं होता।
जब मैंने इस दुःख के कारण को समझने का प्रयास किया, तो देखा कि सच में संसार का प्रत्येक प्राणी दुःख से ग्रसित है, परंतु प्रत्येक का दुःख अलग-अलग कारणों से है। इसका हल निकालना आसान नहीं है।
कोई संतान से दुःखी है,
कोई शरीर से दुःखी है,
कोई मन से दुःखी है,
कोई धन से दुःखी है,
कोई दूसरों का सुख देखकर दुःखी है,
कोई पद, कोई काम या अन्य कारणों से दुःखी है।
जब यह सब देखा, तो मैंने अपने आप से सवाल किया —
“इस दुःख का वास्तविक कारण क्या है और इसे भोग कौन रहा है?”
इस प्रश्न के उत्तर खोजने के लिए मैंने मन और आत्मा में गहन विचार किया। दो उत्तर सामने आए — इच्छा और शरीर।
इच्छाओं पर विचार करने पर यह पूर्ण रूप से सही नहीं लगा, क्योंकि इच्छाएँ केवल दुःख का कारण नहीं हो सकतीं। इच्छाएँ सुख का कारण भी बन सकती हैं। इच्छाहीन मनुष्य तो तृण तुल्य है।
फिर मैंने सोचा — दुःखों का भोक्ता कौन है?
उत्तर मिला — शरीर को।
क्योंकि दुःख के अनेक कारण हैं, परंतु दुःख का अनुभव करने वाला वही शरीर है।
मेरे अनुसार, इच्छाओं को जन्म देने वाला भी शरीर ही है।
दु:ख चाहे अध्यात्मिक हो, चाहे भौतिक ,चाहे सांसारिक हो।
इन सभी दुखों का भोगी केवल शरीर ही है।
कारण –
इच्छाओं की जननी शरीर ही है।
इच्छाओं से उत्पन्न लालसा, द्वेष, क्रोध, अहंकार, काम आदि भावनाएँ शरीर के माध्यम से ही अनुभव की जाती हैं।
अर्थात् इच्छाओं से उत्पन्न सुख और दुख का अनुभव शरीर ही करता है, न कि इच्छा स्वयं।
भले ही दुख मानसिक क्यों न हो, उसकी अनुभूति अंततः शरीर को ही होती है।
इस प्रकार, किसी भी कारण से उत्पन्न दुख या सुख का अनुभव और उसकी अनुभूति शरीर के द्वारा ही संभव है।
यह भी पढ़ें: ऐ दर्द | Ae Dard | Kushal Sharma
इंस्टाग्राम पर फॉलो करें: @kushalkoshals1

Atti utam