अगर मेरी ख़ामोशी बोल सकती | कुशल शर्मा

अगर मेरी ख़ामोशी बोल सकती Agar meri khamoshi bol sakti Poem Shayri Kushal sharma

अगर मेरी ख़ामोशी बोल सकती | Agar meri khamoshi bol sakti

    अगर मेरी ख़ामोशी बोल सकती,
   तो जज़्बातों से हजारों सवाल होते।
     इस तन्हाई के मंज़र में,
   मैं अपनी ही परछाई से हर रोज़ बातें करता।
    मेरी आवाज़ ही अब मेरा आईना है
    और मेरी ख़ामोशी…
  हर रोज़ मुझसे बेवक्त कई सवालात करती है।

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