मैं नदी का पत्थर हूँ (Main Nadi Ka Pathar Hoon)
अपनों से टकराकर मजबूत हुआ,
अपनों से टकराकर चकनाचूर हुआ ।।
लाख दर्द सहकर जीने के अनुकूल हुआ,
चोट सीने में खाकर खाकर मोती मोती का रूप हुआ ।।
भावार्थ:-
१ पत्थर और इंसान में एक ही समानता है। नदी के पत्थर जब पानी के बहाव में बहते तो आपस में ही टकराते हैं टकराने में जो शेष रहते वे मजबूत कहलाते और जो आपस में टकराने पर चकनाचूर हो जाते। वे रेत के कण बन जाते जिंदगी का वही हाल जो संघर्ष सहन करते । वह होनहार कहलाते और जो संघर्ष में हार जाते वह रेत की तरह चकनाचूर हो जाते।
२ पत्थर अनेकों बार टकराने से अदभुत रूप में आकार ले लेता। उसी प्रकार इंसान भी अनेक ठोकरें खाकर जीने का सलीका सीख जाता। जिस प्रकार पत्थर अनेकों बार चोट सहनकर मोती का रूप ले लेता । उसी प्रकार इंसान भी लाख सघर्ष सहकर सज्जन का रूप ले लेता।
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