अगर मेरी ख़ामोशी बोल सकती | Agar meri khamoshi bol sakti
अगर मेरी ख़ामोशी बोल सकती,
तो जज़्बातों से हजारों सवाल होते।
इस तन्हाई के मंज़र में,
मैं अपनी ही परछाई से हर रोज़ बातें करता।
मेरी आवाज़ ही अब मेरा आईना है
और मेरी ख़ामोशी…
हर रोज़ मुझसे बेवक्त कई सवालात करती है।
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