विवेक की वाणी |Vivek Ki Vanni |Kushal Sharma
सच का मित्र होता है एक,
झूठ के बन जाते अनेक।
कहना आसान है “मैं नेक”,
पर बोलने में चाहिए विवेक।
सच का झूठ से नहीं है मेल,
एक है उजाला, दूजा है खेल।
सच की हर दिन बढ़ती बेल,
झूठ का अंत होता है जेल।
कोई करे या करके देख ले ये खेल,
सच और झूठ का बड़ा पेचीदा है खेल।
जो इन दोनों में अंतर जान पाया,
वही इस युग में कह लाएगा सच देव।
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